हमारे खिलाफ उसके साथ रिलेशनशिप  मे जुडे कुछ ही दिन हुयें हैं । उसके बातें मुझे बहुत याद सताती है, मै जैसे चाहती थी वैसे ही वो है । बहुत ही इज्जत करता है मेरी, जब भी हम मिलते, बिना पूछे कुछ नहीं करता । जैसे कि क्या मै तुम्हारी हाथ पकड सकता हूं ? इत्यादी । उसका पूछना मुझे बहुत आच्छा लगता है, जब वह पूछता है तो ओर ज्याजा मुझे आच्छा लगता है ।

जी तो करता है उसके साथ दिन भर बातें करूं, पर उसके पास समय न होने के काऱण वो ज्यादा, मेरे साथ समय नहीं बिता पता । वह समय को बहुत महत्व देता है, मुझसे भी ज्यादा, वैसे मै भी उसके साथ मिलने के बाद समय को बहुत ज्यादा महत्व देने लगी हूं । उसके साथ कुछ पल बिताने के बाद न जाने क्यों ? सब कुछ आच्छा ही आच्छा लगता है ।

हमारे खिलाफ, एक प्रेम कहानी
हमारे खिलाफ, एक प्रेम कहानी

जब हम कहीं घूमने के लिए जाते तो, वैसे रहते हैं जैसे, हम दोनो गर्लफ्रैंड बोयफ्रैंड नहीं हम दोनो आच्छे दोस्त है । और रोड मे तो हाथ पकड के घूमना
वह पसंद नहीं करता है, यही मै चाहती जो कि वह चाहता है । छोटीछोटी बातों पर जोर से हाँस देता है । वैसे मेरा कहने का यह मतलब नही कि कहीं भी हाँस देता है, महौल के अनुसार ही हाँसता है । वो जितने भी शब्द, उसके मूँ से निकालता है मेरे दिल को छूः जाते है, और जितने भी बोलता है वह बहुत ही सोच समझ के बोलता है ।
 
एक दिन पूछी कि इतना मोहब्बात क्यों करते हो ? तो मेरे इस सवाल का जवाब देते हुये कहा कि मैं तुम्हे खोना नहीं चहता, तुम मुझे बहुत आच्छी लगती हो । क्या पता मेरे छोटे से गलती के वाजह से तुम मुझे छोड के चाली जाओ । मै उस्से समझाई कि याकिन मनो मेरी न ही कोई तुम्हारे जैसा कोई मुझे मिलेगा नहीं कोई है । मै तुम्हे कभी छोड के नहीं जा सकती, अगर हम किसी कारण बिछाड गये तो, मुझे जिंदगी भर तुम्हारे कमी महशूस होगी । अगर मै किसी कारण आपको छोड दि तो, ये मेरी जींदगी कि सबसे बडी भूल होगी ।
 
एक जिन उस्से दोस्त बना के अपने घर लाई थी, उसने तो सबको हाँसा के तोट पोट कर दिया । इतना हाँसाया कि कुछ देर तक हाँसी ही रोक नही पा रही थी । मेरे घर वालो के सबके दिल जीत लिया । इतना होने के बावजूद, मैं अपने घर वालों को उसके और मेरे बीच के रिस्ता के बारे मे नहीं बताई । और शायद बताऊंगी भी नहीं, क्योंकि वो दूसरे धर्म का है, और मेरे परीवार वाले दूसरे धर्म के खिलाफ है । जब उस्से मेरे घर लाई थी तो, मै घर वालों से झूट बोली थी कि, वो हमारे धर्म का ही है । भाग के शादी कर लेते पर मुझे डार है कि घर वाले मिलके हम दोनो को टपका का दें ।

पता नहीं इसानों मे धर्म, जाती के प्रती कब तक भेदभाव रेहीगी । पता नहीं कब हम दोनो एक दूसरे के होंगे
? हम दोनो के ये हल कब लोग समझेंगे ? और हम एक दूसरे का कब होंगे ? जींदगी बित्ती जा रही है, साथ मे समय भी पार होता जा रहा है, और कहानी भी लम्बा होता जा रहा है । लेकिन हर कहानी का खतम तो होना ही है, चाहे जितना भी लम्बा क्यों न हो जायें ।

Leave a Reply

Close Menu